मुरिया जनजाति के गोत्रों ¼टोटम½ का जीव एवं प्राकृतिक जगत से संबंध ¼बस्तर संभाग के विशेष संदर्भ में½
रत्नाबाला मोहंती1, दानेन्द्र श्रीहोल2
1विभागाध्यक्ष ¼समाजशास्त्र½] शासकीय दंतेश्वरी स्नातकोत्तर महाविद्यालय] दंतेवाड़ा] छत्तीसगढ़] भारत।
2अतिथि व्याख्याता ¼समाजशास्त्र½] शासकीय दंतेश्वरी स्नातकोत्तर महाविद्यालय] दंतेवाड़ा] छत्तीसगढ़] भारत।
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
आदिम समाजों को अपने पारिवारिक क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का गहन ज्ञान होता है। उनका जीवन प्रकृति के साथ अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ होता है। प्रकृति ही उनके जीवन दर्शन का केंद्र होती है और उनकी आस्था का आधार भी। यही कारण है कि आदिवासी समुदायों में अनेक सामाजिक मान्यताएँ और धार्मिक विश्वास प्रकृति से गहरे जुड़े होते हैं। मुरिया जनजाति की सामाजिक संरचना में गोत्र (क्लैन) की विशेष भूमिका होती है। प्रत्येक गोत्र किसी न किसी पवित्र प्राकृतिक प्रतीक जिसे टोटम कहा जाता है, से संबंधित होता है। यह टोटम कोई वृक्ष, पशु, पक्षी अथवा कोई अन्य प्राकृतिक तत्व हो सकता है। मुरिया जनजाति अपने टोटम से संबंधित वस्तुओं को अत्यंत पवित्र मानती है। उन्हें न तो क्षति पहुंचाई जाती है और न ही उनका उपभोग किया जाता है, क्योंकि यह धार्मिक और सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता है। टोटम चाहे जीवित हों या निर्जीव, वे जनजातियों की विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक होते हैं। इस प्रकार, आदिवासी समाज और प्रकृति के मध्य एक जीवंत, धार्मिक तथा सांस्कृतिक संबंध स्थापित होता है, जो उनके जीवन की आधारशिला बनती है।
KEYWORDS: मुरिया] आदिवासी] टोटम] गोत्र] प्रकृति] जनजाति।
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मुरिया जनजाति का परिचय:-
भारत एक विशाल और विविधताओं से भरपूर देश है, जहाँ 225 से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% हिस्सा हैं। ये जनजातियाँ अपनी विशिष्ट भाषाओं, रीति-रिवाजों, पारंपरिक पहनावे, विवाह पद्धतियों और धार्मिक आस्थाओं के माध्यम से एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हीं जनजातियों में से एक प्रमुख जनजाति है मुरिया जनजाति, जो मुख्यतः छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में निवास करती है। “मुरिया”शब्द की उत्पत्ति “मूर” से हुई है, जिसका अर्थ होता है “पलाश का वृक्ष”। बस्तर क्षेत्र में पलाश वृक्ष की प्रचुरता के कारण, इस वृक्ष की छाया में निवास करने वाले समुदाय को मुरिया कहा जाने लगा। मुरिया जनजाति गोंड समुदाय की एक उपजाति है और इनकी प्रमुख भाषा कोया है, जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है। इनके सामाजिक संगठन में “घोटुल” नामक संस्था का विशेष महत्व है, जो युवाओं को सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान करती है। मुरिया जनजाति की संस्कृति में लोकनृत्य, संगीत और पारंपरिक त्योहारों का विशेष स्थान है। ये लोग कृषि पर निर्भर रहते हैं और उनकी जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाती है। उनके पारंपरिक परिधान और भोजन उनकी सांस्कृतिक पहचान को और भी समृद्ध बनाते हैं। इस प्रकार, मुरिया जनजाति भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी अनूठी परंपराओं और जीवनशैली के माध्यम से देश की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करती है।
मुरिया जनजाति के प्रकार:-
बस्तर क्षेत्र की मुरिया जनजाति को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा गया हैः राजा मुरिया, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया। राजा मुरिया मुख्यतः जगदलपुर क्षेत्र में निवास करते हैं और हल्बी भाषा बोलते हैं। वहीं, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया नारायणपुर, कोंडागांव और दंतेवाड़ा जिलों में बसे हुए हैं। मुरिया जनजाति, गोंड जनजाति का एक उप-समूह है, जिसमें डोकरा गोड़, जोरा गोड़ और राज गोड़ जैसे प्रमुख उपवर्ग शामिल हैं। मुरिया समाज में सामाजिक संरचना गोत्रों के आधार पर होती है। क्रुक्स के अध्ययन के अनुसार, मुरिया जनजाति में छह प्रमुख गोत्र समूह हैंः छगना, देवार, कोरझान, मरकाम, पोयाम और सोहाम। इन गोत्रों के माध्यम से मुरिया जनजाति की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान स्थापित होती है, जो उनकी पारंपरिक जीवनशैली और मान्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुरिया जनजाति के प्रमुख गोत्र:-
बस्तर क्षेत्र की मुरिया जनजाति की सामाजिक संरचना में गोत्रों का विशेष महत्व है। प्रत्येक गोत्र किसी न किसी प्राकृतिक तत्व या जीव-जंतु से जुड़ा होता है, जिसे वे अपना कुल देवता या प्रतीक मानते हैं। इन गोत्रों से संबंधित आस्थाएँ और परंपराएँ मुरिया जनजाति की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करती हैं। नीचे मुरिया जनजाति के प्रमुख गोत्रों का विवरण प्रस्तुत हैः-
1. मरकाम गोत्रंः इस गोत्र के लोग महुआ वृक्ष से जुड़े होते हैं। वे महुआ वृक्ष को पवित्र मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं।
2. पोटाई गोत्रः इस गोत्र का संबंध बांस वृक्ष से है। बांस को काटना अशुभ माना जाता है, जबकि शुभ कार्यों में इसका विशेष महत्व होता है।
3. तेकाम गोत्रः तेकामी गोत्र के लोग तेंदू वृक्ष से संबंधित होते हैं। इसके पत्तों और फलों को पवित्र माना जाता है।
4. मड़कामी या नागवंशी गोत्रः इस गोत्र के लोग नाग को कुल प्रतीक मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं। नाग को मारना वर्जित होता है।
5. कुंजामी या मंडावी गोत्रः इस गोत्र के लोग मोर से जुड़े होते हैं। मोर के पंखों को शुभ माना जाता है और मोर को देव स्वरूप मानकर उसकी हत्या को अशुभ माना जाता है।
6. कुड़ियामी या उईके गोत्रः इस गोत्र के लोग भालू से जुड़े होते हैं। वे भालू को मारना या उसका मांस खाना वर्जित मानते हैं।
7. मंडावी गोत्रः इस गोत्र के लोग जल स्रोतों को पवित्र मानते हैं और मछलियों की रक्षा करते हैं।
8. क्वाची गोत्रः इस गोत्र के लोग बंदर को कुल देवता मानते हैं।
9. टेकानी गोत्रः इस गोत्र के लोग गरुड़ (बाज) को आकाश का स्वामी मानते हैं।
10. सोढ़ी गोत्रः इस गोत्र के लोग बाघ को रक्षक देवता मानते हैं।
11. सलाम गोत्रः इस गोत्र के लोग साल वृक्ष से संबंध रखते हैं और इसे पवित्र मानते हैं।
12. कुरझाम गोत्रः इस गोत्र के लोग हिरण का शिकार करना निषेध मानते हैं।
मुरिया जनजाति की यह गोत्रीय व्यवस्था उनकी प्रकृति के प्रति गहरी आस्था और संरक्षण की भावना को दर्शाती है। प्रत्येक गोत्र की अपनी विशिष्ट परंपराएँ और आस्थाएँ हैं, जो उनकी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मुरिया जनजाति आज भी प्राकृतिक संसाधनों पर अपनी आजीविका और सांस्कृतिक जीवन के लिए निर्भर है। इनकी धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति और उसके तत्वों की पूजा का विशेष स्थान है। प्रत्येक गोत्र किसी न किसी प्राकृतिक तत्व या जीव-जंतु से जुड़ा होता है, जिसे वे अपना टोटेम (कुल प्रतीक) मानते हैं। इन टोटेमों को वे पवित्र मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। मुरिया जनजाति के लोग अपने टोटेम से संबंधित जीव या वृक्ष को नुकसान नहीं पहुंचाते, उनका शिकार नहीं करते और न ही उनका सेवन करते हैं। यदि टोटेम से संबंधित कोई जीव मर जाता है, तो वे उसके लिए शोक व्यक्त करते हैं। इस प्रकार की टोटेमिक व्यवस्था मुरिया जनजाति की सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो समुदाय के प्रत्येक सदस्य को अपने गोत्र की रक्षा और सम्मान करने के लिए बाध्य करती है। यह प्रणाली न केवल उनकी धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि प्रकृति के प्रति उनके गहरे सम्मान और संरक्षण की भावना को भी प्रकट करती है।
मुरिया जनजाति और प्रकृति का सम्बन्ध - टोटेमवाद मुरिया समुदाय की आत्मा
मुरिया समुदाय की पहचान टोटेमवाद की परंपरा में निहित है, जो प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुरिया आदिवासी समुदाय और प्रकृति के बीच अटूट रिश्ता स्थापित है। मुरिया जनजाति का प्रतीक चिह्न (टोटेम) प्रकृति से गहरा जुड़ाव रखता है। यह समुदाय दृढ़ विश्वास रखता है कि उनके पूर्वजों की उत्पत्ति इसी टोटेम से हुई है। वे अपने प्रतीक चिह्न की सुरक्षा करते हैं और उसे कोई क्षति नहीं पहुंचाते। उनकी पारंपरिक प्रथाओं, सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, धार्मिक कर्मकांडों और विवाह संस्कारों में इन टोटेमों का अत्यधिक महत्व है।
प्रकृति के साथ जीवंत संबंधः-
प्रकृति में विद्यमान जल, वन, नदियां, पशु-पक्षी, और वनस्पति मुरिया समुदाय के जीवन के अपरिहार्य अंग हैं। यह समुदाय वन आधारित जीवनशैली को अपनाता है। कृषि कार्य, वन उत्पादों का संग्रह और हस्तकला उनके आजीविका के प्रमुख स्रोत हैं। उनकी सामाजिक व्यवस्था में पारंपरिक पंचायती राज, उत्सव-त्योहार, संगीत और नृत्य कला का विशेष महत्व है। उनके सांस्कृतिक जीवन पर प्राकृतिक परिवेश और पुरातन मान्यताओं का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।
गोत्र प्रणाली और कुल चिह्नः-
आदिवासी समुदाय अपने समूह में टोटेम के रूप में किसी विशेष वृक्ष या जीव-जंतु का चयन करता है, जैसे महुआ, तेंदू, बाघ, केंचुआ, सर्प, मछली, बकरा, धान आदि को अपने कुल के प्रतीक के रूप में स्वीकार करते हैं। इसे गोत्र या टोटेम की संज्ञा दी जाती है। इस समुदाय में टोटेम को एक पावन और पूजनीय इकाई के रूप में स्थापित किया गया है। मुरिया समुदाय पारंपरिक कार्यों को संपन्न करता है और सामुदायिक एकजुटता को प्राथमिकता देता है।
मुरिया जनजाति के विभिन्न गोत्रों में मरकाम नागवंशी, उईके, कुरझाम, सोड़ी, मंडावी, कश्यप, मुचाकी, लेकामी, पंदामी, वंजाम आदि सम्मिलित हैं। नागवंश में सर्प, कछिम वंश में कछुआ, बकरावन में बकरी, बाघवन में बाघ, बोड़ मिनुवंश में मछली आदि उनके कुलदेवता हैं। इन प्राणियों की मृत्यु पर वे शोक मनाते हैं। इन्हीं गोत्रों के आधार पर मुरिया जनजाति में विवाह और सामाजिक ढांचा निर्धारित होता है। समगोत्रीय विवाह निषिद्ध माना जाता है। आदिवासी समाज विवाह को एक पवित्र प्रक्रिया मानता है।
वन आधारित जीवनशैलीः-
मुरिया जनजाति का प्रकृति से गहरा और भावनात्मक रिश्ता होने के कारण उनकी जीवन परंपराएं और आस्था प्रकृति केन्द्रित होती है। यह जनजाति पूर्णतः वनों पर आश्रित है। वनों से भोजन सामग्री, इमारती लकड़ी, औषधीय पौधे आदि आवश्यक संसाधन प्राप्त करते हैं। शहद, महुआ, चिरौंजी, तेंदुपत्ता, साल के बीज आदि उनकी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण घटक हैं। मुरिया जनजाति अनेक पशु-पक्षियों और वृक्षों को पावन एवं देवतुल्य मानती है। वे प्रकृति में संतुलन बनाए रखने हेतु अनावश्यक शिकार से बचते हैं और जंगलों तथा वन संपदा की रक्षा करते हैं। पीपल, महुआ, तेंदू, बांस, साल, डूमर, अर्जुन आदि वृक्ष विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष स्थान रखते हैं।
घोटुलः- शिक्षा की पारंपरिक संस्था
मुरिया जनजाति में घोटुल नामक संस्था विद्यमान है, जहां युवा पीढ़ी को सामाजिक और पर्यावरणीय ज्ञान प्रदान किया जाता है। साथ ही वन संरक्षण, पारंपरिक कृषि और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की शिक्षा दी जाती है।
प्रकृति केन्द्रित सांस्कृतिक जीवनः-
मुरिया जनजाति की संस्कृति में प्रकृति से जुड़े अनेक पर्व मनाए जाते हैं। उनके उत्सव, त्योहार, परंपरा, संस्कृति, भोजन, रहन-सहन, आस्था, लोक पर्व आदि सभी प्रकृति से जुड़े हुए हैं क्योंकि यह जनजाति प्रकृति पूजक है। वन संसाधनों की सुरक्षा अनेक पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। वनों और प्रकृति के मध्य ही उनका जीवन बसा है। प्रकृति से उनकी आस्था, संबंध, लगाव एवं गहरा जुड़ाव है। वनौषधि से जुड़े होने के कारण वे अनेक औषधियों का गहरा ज्ञान रखते हैं। यह जाति जंगली जड़ी-बूटियों से विविध बीमारियों का उपचार करती है। यह ज्ञान उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है। मुरिया जनजाति के गोत्र और जीव-जंतुओं के बीच गहरा संबंध होने के कारण इन जीवों को केवल प्रकृति का अंश नहीं मानते बल्कि अपने कुल पूर्वजों और देवताओं का प्रतीक मानते हैं। यही कारण है कि उनकी संस्कृति में वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण की मजबूत परंपरा देखने को मिलती है।
उद्देश्य:-
प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में निवासरत मुरिया आदिवासी समुदाय की गोत्र व्यवस्था, प्रकृति के प्रति उनके संबंध, और सामाजिक मान्यताओं का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन निम्नलिखित चार प्रमुख बिंदुओं पर केन्द्रित हैः
1. मुरिया जनजाति की गोत्र व्यवस्था सिर्फ सामाजिक नहीं यह प्रकृति संरक्षण की परंपरागत प्रणाली भी है।
2. प्रत्येक गोत्र अपने टोटेम से जुड़ी प्रजाति को मानते है जिससे जैव-विविधता सुरक्षित रहती है।
3. जनजाति समाज अपने पीढ़ी को बचपन से ही प्रकृति का संरक्षण एवं आदर करना सिखाती है।
4. प्रकृति और आत्मा के सम्बन्ध का सैद्धांतिक विश्लेषण करना।
शोध प्रविधि:-
प्रस्तुत शोध में वर्णनात्मक शोध प्ररचना को अपनाया गया है, जो अध्ययन की विषयवस्तु, मुरिया आदिवासी समुदाय की गोत्र व्यवस्था, प्रकृति के साथ उनके संबंध, और सामाजिक मान्यताओं, का गहन विश्लेषण करने के लिए उपयुक्त है। वर्णनात्मक शोध का उद्देश्य किसी समुदाय, समूह, या स्थिति की विशेषताओं का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करना होता है, जिससे संबंधित तथ्यों और घटनाओं की सटीक जानकारी प्राप्त की जा सके। इस शोध में वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से डेटा संकलन किया गया है, जिसमें साक्षात्कार, प्रत्यक्ष अवलोकन, और प्रलेखों का विश्लेषण शामिल है। संग्रहित तथ्यों का वर्णात्मक और सैद्धांतिक विश्लेषण कर, मुरिया जनजाति की पारंपरिक संरचनाओं और प्रकृति के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया गया है। इस प्रक्रिया में, शोधकर्ता ने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर तथ्यों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया है। वर्णनात्मक शोध प्ररचना के माध्यम से, यह अध्ययन मुरिया समुदाय की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचनाओं का समग्र चित्र प्रस्तुत करता है, जो उनके पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की समझ को उजागर करता है।
सामग्री - संकलनः-
प्राथमिक तथ्यों, सूचनाओं का संकलन साक्षात्कार, समूहवार्ता आदि गुणात्मक शोध उपकरणो का उपयोग किया गया है।
निष्कर्ष:-
मुरिया आदिवासी समुदाय के जीवन के विविध पहलुओं का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका रहन-सहन, परंपराएँ, संस्कृति, जीविकोपार्जन के साधन, रीति-रिवाज और धार्मिक अनुष्ठान पूर्णतः प्रकृति और प्राकृतिक मान्यताओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। वे जल, जंगल, जमीन और वन्य जीवों को न केवल संसाधन के रूप में देखते हैं, बल्कि उन्हें पवित्र मानकर उनकी पूजा करते हैं। उनकी गोत्र व्यवस्था और टोटेमवाद भी प्रकृति संरक्षण की परंपरागत प्रणाली का हिस्सा हैं, जो जैव विविधता को संरक्षित रखने में सहायक हैं। हालांकि, वर्तमान समय में बदलती परिस्थितियों, जैसे वन क्षेत्रों में कमी, औद्योगीकरण, शहरीकरण और बाहरी लोगों के आगमन के कारण, मुरिया समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली और जीविकोपार्जन के साधन प्रभावित हो रहे हैं। वनों पर निर्भर रहने वाले इस समुदाय के लिए अब जीविकोपार्जन कठिन होता जा रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। इसके अतिरिक्त, सरकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के प्रभाव से उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली भी संकट में हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और कुपोषण जैसी समस्याएँ भी मुरिया समाज के विकास में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, यह आवश्यक है कि मुरिया जनजाति जैसे आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, संस्कृति और जीवनशैली का संरक्षण किया जाए। उनकी सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति गहन संबंध को समझते हुए, नीति निर्माण और विकास योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे न केवल उनके सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को भी संरक्षित रखा जा सकेगा।
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Received on 21.06.2025 Revised on 20.07.2025 Accepted on 30.08.2025 Published on 12.11.2025 Available online from November 19, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(4):209-212. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00034 ©A and V Publications All right reserved
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